विशेष (16/07/2022)
पतà¥à¤°à¤•ारिता से साहितà¥à¤¯ में चली आई ‘न हनà¥à¤¯à¤¤à¥‡â€™ - इंदिरा दांगी


आचारà¥à¤¯ संजय दà¥à¤µà¤¿à¤µà¥‡à¤¦à¥€ की नई किताब 'न हनà¥à¤¯à¤¤à¥‡' को खोलने से पहले मन पर à¤à¤• छाप थी कि पतà¥à¤°à¤•ारिता के आचारà¥à¤¯ की पà¥à¤¸à¥à¤¤à¤• है और दिवंगत पà¥à¤°à¤–à¥à¤¯à¤¾à¤¤à¥‹à¤‚ के नाम लिखे सà¥à¤®à¥ƒà¤¤à¤¿-लेख हैं, जैसे समाचार पतà¥à¤°à¥‹à¤‚ में संपादकीय पृषà¥à¤ पर पà¥à¤°à¤•ाशित हà¥à¤† करते ही हैं; लेकिन पà¥à¤¸à¥à¤¤à¤• का पहला ही शबà¥à¤¦-चितà¥à¤° मेरी इस धारणा को तोड़ता है। ‘सतà¥à¤¤à¤¾ साकेत का वीतरागी’ में वे पूरà¥à¤µ पà¥à¤°à¤§à¤¾à¤¨à¤®à¤‚तà¥à¤°à¥€ और à¤à¤¾à¤°à¤¤ के महान नेता अटल बिहारी वाजपेयी को देश के बड़े बेटे के तौर पर याद करते हैं; राजनीति से ऊपर जिसके लिये देश था। इसीलिये उनके देहवसान पर पूरा देश रोया और ये संसà¥à¤®à¤°à¤£ फिर उनकी सà¥à¤®à¥ƒà¤¤à¤¿ से हमें नम कर जाता है। ‘उनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ à¤à¥‚लना है मà¥à¤¶à¥à¤•िल’ वैचारिकता के शिलà¥à¤ª-सà¥à¤¤à¤° पर à¤à¤• नये पà¥à¤°à¤¯à¥‹à¤— का संसà¥à¤®à¤°à¤£ था, जबकि लेखक ने राषà¥à¤Ÿà¥à¤°à¥€à¤¯ सà¥à¤µà¤¯à¤‚सेवक संघ के पà¥à¤°à¤¥à¤® पà¥à¤°à¤µà¤•à¥à¤¤à¤¾ शà¥à¤°à¥€ माधव गोविंद वैध के जीवन की अनगिनत उपलबà¥à¤§à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ के बजाय उनको घर के à¤à¤¸à¥‡ बड़े-बà¥à¥›à¥à¤°à¥à¤— के तौर पर याद किया है, जिनका जीवन आगे आने वाली पीढ़ियों के लिये रोशनी का à¤à¤• सà¥à¤¤à¤‚ठरहेगा। ‘बौदà¥à¤§à¤¿à¤• तेज से दमकता वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿à¤¤à¥à¤µâ€™ संसà¥à¤®à¤°à¤£-रेखाचितà¥à¤° अनिल माधव दवे को पाठक के ज़हन में राजनेता और पà¥à¤°à¤šà¤¾à¤°à¤• के अलावा धरती के हितैषी की छवि और छाप à¤à¥€ देता है। जब लेखक उनकी वसीयत बयान करते हैं कि “...मेरी सà¥à¤®à¥ƒà¤¤à¤¿ में कोई सà¥à¤®à¤¾à¤°à¤•, पà¥à¤°à¤¸à¥à¤•ार, पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤®à¤¾ सà¥à¤¥à¤¾à¤ªà¤¨ न हो। मेरी सà¥à¤®à¥ƒà¤¤à¤¿ में यदि कोई कà¥à¤› करना चाहते हैं तो वृकà¥à¤· लगाà¤à¤‚।†जिस राजनेता का सरà¥à¤µà¤¸à¥à¤µ जल, जंगल, जमीन के नाम रहा हो और जिसके कारà¥à¤¯à¤¾à¤²à¤¯ का नाम ही ‘नदी का घर’ हो, उसकी वसीयत वृकà¥à¤·à¥‹à¤‚ के सिवाय और कà¥à¤¯à¤¾ होती। ‘उनà¥à¤¹à¥‹à¤¨à¥‡ सिखाया ज़िंदगी का पाठ’ में लेखक ने अपने पतà¥à¤°à¤•ारिता-गà¥à¤°à¥ पà¥à¤°à¥‹à¤«à¥‡à¤¸à¤° कमल दीकà¥à¤·à¤¿à¤¤ को याद किया है; à¤à¤¸à¥‡ ही गà¥à¤°à¥à¤œà¤¨à¥‹à¤‚ के परिशà¥à¤°à¤®, अनà¥à¤¶à¤¾à¤¸à¤¨ और मेधा ने माखनलाल चतà¥à¤°à¥à¤µà¥‡à¤¦à¥€ पतà¥à¤°à¤•ारिता विशà¥à¤µà¤µà¤¿à¤¦à¥à¤¯à¤¾à¤²à¤¯ को राषà¥à¤Ÿà¥à¤°à¥€à¤¯-अंतरराषà¥à¤Ÿà¥à¤°à¥€à¤¯ पहचान दिलवाई। ‘रचना, सृजन और संघरà¥à¤· से बनी शखà¥à¤¸à¤¿à¤¯à¤¤â€™ में शिव अनà¥à¤°à¤¾à¤— पटैरया को याद करते हà¥à¤ संजय जी शबà¥à¤¦-रेखाओं से कैसा अविसà¥à¤®à¤°à¤£à¥€à¤¯ चितà¥à¤° खींचते हैं, “वे ही थे जो खिलखिलाकर मà¥à¤•à¥à¤¤ हंसी हंस सकते थे, खà¥à¤¦ पर à¤à¥€, दूसरों पर à¤à¥€à¥¤â€ à¤à¤¸à¥‡ पातà¥à¤° दà¥à¤°à¥à¤²à¤ हैं आज–समय में à¤à¥€, साहितà¥à¤¯ में à¤à¥€à¥¤ ‘सरोकारों के लिये जूà¤à¤¨à¥‡ वाली योदà¥à¤§à¤¾â€™ संसà¥à¤®à¤°à¤£ पाठक को à¤à¤• à¤à¤¸à¥€ शिकà¥à¤·à¤¿à¤•ा दविंदर कौर उपà¥à¤ªà¤² से मिलवाता है, जो सखà¥à¤¤, अनà¥à¤¶à¤¾à¤¸à¤¨ पà¥à¤°à¤¿à¤¯, नरà¥à¤® और ममतामयी थीं। लेखक ने अपनी शिकà¥à¤·à¤¿à¤•ा के समगà¥à¤° वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿à¤¤à¥à¤µ को अपनी à¤à¤• पंकà¥à¤¤à¤¿ से जैसे अमिट बना दिया है, “पूरी जिंदगी में उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने किसी की मदद नहीं ली।†‘बहà¥à¤¤ कठिन है उन–सा होना’ शिलà¥à¤ª के सà¥à¤¤à¤° पर पà¥à¤¸à¥à¤¤à¤• का सबसे लाजवाब संसà¥à¤®à¤°à¤£ है, जिसमें लेखक ने छतीसगॠके पà¥à¤°à¤¥à¤® मà¥à¤–à¥à¤¯à¤®à¤‚तà¥à¤°à¥€ अजीत जोगी को याद करते हà¥à¤ लिखा है, “वे दरअसल पढ़ने-लिखने वाले इंसान थे। बहà¥à¤ªà¤ ित और बहà¥à¤µà¤¿à¤—à¥à¤¯à¥¤ किंतॠवे ‘शकà¥à¤¤à¤¿â€™ चाहते थे, जो साहितà¥à¤¯ और संसà¥à¤•ृति की दà¥à¤¨à¤¿à¤¯à¤¾ उनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ नहीं दे सकती थी। इसलिये शकà¥à¤¤à¤¿ जिन-जिन रासà¥à¤¤à¥‹à¤‚ से आती थी, वह उन सब पर चले। वे आईपीà¤à¤¸ बने, आईà¤à¤à¤¸ बने, राजनीति में गये और सीà¤à¤® बने।...वे कलेकà¥à¤Ÿà¤° थे तो जननेता की तरह वà¥à¤¯à¤µà¤¹à¤¾à¤° करते थे, जब मà¥à¤–à¥à¤¯à¤®à¤‚तà¥à¤°à¥€ बने तो कलेकà¥à¤Ÿà¤° सरीखे दिखे।†वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿à¤¤à¥à¤µà¥‹à¤‚ का à¤à¤¸à¤¾ मूलà¥à¤¯à¤¾à¤‚कन सिरà¥à¤« साहितà¥à¤¯ में ही संà¤à¤µ है। संजय जी की लेखनी की à¤à¤• विशिषà¥à¤Ÿà¤¤à¤¾ है कि वे अपनी रचना में à¤à¤¸à¤¾ वातावरण, à¤à¤¸à¥€ à¤à¤¾à¤·à¤¾ रचते हैं कि किसी अपरिचित पातà¥à¤° के वरà¥à¤£à¤¨ में à¤à¥€ पाठक को आतà¥à¤®à¥€à¤¯ की सà¥à¤®à¥ƒà¤¤à¤¿-सा आसà¥à¤µà¤¾à¤¦à¤¨ मिलता है। ‘धà¥à¤¯à¥‡à¤¯à¤¨à¤¿à¤·à¥à¤ संपादक और पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤¬à¤¦à¥à¤§ पतà¥à¤°à¤•ार’ संसà¥à¤®à¤°à¤£ में अपने पतà¥à¤°à¤•ारिता विशà¥à¤µà¤µà¤¿à¤¦à¥à¤¯à¤¾à¤²à¤¯ के पà¥à¤°à¤¥à¤® कà¥à¤²à¤ªà¤¤à¤¿ राधेशà¥à¤¯à¤¾à¤® शरà¥à¤®à¤¾ को वे किस तरह याद करते हैं देखिये, “वे आते तो सबसे मिलते और परिवारों में जाते। अपने साथियों और अधीनसà¥à¤¥à¥‹à¤‚ के परिजनों, बचà¥à¤šà¥‹à¤‚ की सà¥à¤¥à¤¿à¤¤à¤¿, पà¥à¤°à¤—ति, पढ़ाई और विवाह सब पर उनकी नजर रहती थी।†शà¥à¤¯à¤¾à¤®à¤²à¤¾à¤² चतà¥à¤°à¥à¤µà¥‡à¤¦à¥€ पर लिखा संसà¥à¤®à¤°à¤£ ‘समृदà¥à¤§ लोकजीवन के सà¥à¤µà¤ªà¥à¤¨à¤¦à¥à¤°à¤·à¥à¤Ÿà¤¾â€™ जहां आपको छतà¥à¤¤à¥€à¤¸à¤—ढ़ के लोकसेवक पतà¥à¤°à¤•ार से मिलवायेगा, तो ‘पतà¥à¤°à¤•रिता के आरà¥à¤šà¤¾à¤¯â€™ रेखाचितà¥à¤° में आप à¤à¤• पà¥à¤°à¥‹à¤§à¤¾ डॉ. नंदकिशोर तà¥à¤°à¤¿à¤–ा से मिलेंगे, जिनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने मूलà¥à¤¯à¥‹à¤‚ के आधार पर पतà¥à¤°à¤•ारिता की। ‘à¤à¤¾à¤°à¤¤à¤¬à¥‹à¤§ के अपà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤® वà¥à¤¯à¤¾à¤–à¥à¤¯à¤¾à¤¤à¤¾â€™ à¤à¤• मारà¥à¤®à¤¿à¤• रेखाचितà¥à¤° बन पड़ा है, जिसमें मà¥à¥›à¤«à¥à¤«à¤° हà¥à¤¸à¥ˆà¤¨ से हम मिलते हैं, जिनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने सिरà¥à¤« लेखन के बूते न सिरà¥à¤« जीवन जिया, सतà¥à¤¤à¤¾ के गलियारों से लेकर आम सà¤à¤¾à¤“ं तक में समà¥à¤®à¤¾à¤¨ पाया, अपने समà¥à¤¦à¤¾à¤¯ की चिंता की और कटà¥à¤Ÿà¤°à¤ªà¤‚थियों से कà¤à¥€ नहीं डरे। ‘संवेदना से बà¥à¤¨à¥€ राजनीति का चेहरा’ में जे. जयललिता की अपार लोकपà¥à¤°à¤¿à¤¯à¤¤à¤¾ और जनसेवक की छवि का पता और पड़ताल है तो ‘छतà¥à¤¤à¥€à¤¸à¤—ढ़ का गांधी’ में संत पवन दीवान का à¤à¥‹à¤²à¤¾ संत-वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿à¤¤à¥à¤µà¥¤ ‘à¤à¤• ज़िंदादिल और बेबाक इंसान’ में लेखक ने अपने पà¥à¤°à¤¾à¤¨à¥‡ यà¥à¤µà¤¾ संवाददाता साथी देवेंदà¥à¤° कर को याद किया है, वहीं ‘सà¥à¤µà¤¾à¤à¤¿à¤®à¤¾à¤¨à¥€ जीवन की पाठशाला’ संसà¥à¤®à¤°à¤£ में बसंत कà¥à¤®à¤¾à¤° तिवारी के जà¥à¤à¤¾à¤°à¥‚ वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿à¤¤à¥à¤µ और किरदार को शबà¥à¤¦ दिये हैं। ‘माओवादियों के विरà¥à¤¦à¥à¤§ सबसे पà¥à¤°à¤–र आवाज़’ महेंदà¥à¤° करà¥à¤®à¤¾ जैसे जनसेवक, जननायक से हमें रूबरू करता शबà¥à¤¦-चितà¥à¤° है। ‘माटी की महक’ पà¥à¤°à¤–à¥à¤¯à¤¾à¤¤ राजनेता नंदकà¥à¤®à¤¾à¤° पटेल और उनके पà¥à¤¤à¥à¤° दिनेश पटेल के साथ अपने निजी समय और समà¥à¤ªà¤°à¥à¤• को याद करते हà¥à¤ संजय जी नकà¥à¤¸à¤²à¥€ हिंसा में शहीद अपने इन पà¥à¤°à¤¿à¤¯ वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿à¤¤à¥à¤µà¥‹à¤‚ के बहाने पाठकों से à¤à¤•à¤à¥‹à¤° देने वाले सवाल करते हैं कि इनका कà¥à¤¸à¥‚र कà¥à¤¯à¤¾ था? ‘धà¥à¤¯à¥‡à¤¯à¤¨à¤¿à¤·à¥à¤ जीवन’ शबà¥à¤¦-चितà¥à¤° में लखीराम अगà¥à¤°à¤µà¤¾à¤² को à¤à¤¸à¥‡ मारà¥à¤®à¤¿à¤• ढंग और शैली में याद किया है कि जो इस राजनेता को जानते à¤à¥€ नहीं रहे होंगे, वे à¤à¥€ अब उनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ समà¥à¤®à¤¾à¤¨ से याद करेंगे। बलिराम कशà¥à¤¯à¤ª पर लिखा शबà¥à¤¦-चितà¥à¤° ‘जनजातियों की सबसे पà¥à¤°à¤–र आवाज’ का कथà¥à¤¯ तो पाठक को हिला कर रख देता है। जब हम à¤à¤• à¤à¤¸à¥‡ राजनेता को जानते हैं जिसके पà¥à¤¤à¥à¤° को माओवादियों ने मार डाला, फिर à¤à¥€ जो बसà¥à¤¤à¤° के दूर-दराज इलाकों में जाकर जन-जन से मिलता रहा, कà¥à¤¯à¥‹à¤‚कि वंचित आदिवासी ही उनकी संतान थी। ‘न तो थके और न ही हारे’ में à¤à¤• ईमानदार पतà¥à¤°à¤•ार रामशंकर अगà¥à¤¨à¤¿à¤¹à¥‹à¤¤à¥à¤°à¥€ को लेखक ने याद किया है। पà¥à¤¸à¥à¤¤à¤• का अंतिम संसà¥à¤®à¤°à¤£ कानू सानà¥à¤¯à¤¾à¤² पर ‘विकलà¥à¤ª के अà¤à¤¾à¤µ की पीड़ा’ है। नकà¥à¤¸à¤²à¤µà¤¾à¤¦ को हम उसके रकà¥à¤¤à¤°à¤‚जित परिचय से याद करते हैं, लेकिन लेखक नकà¥à¤¸à¤²à¤¬à¤¾à¤¡à¤¼à¥€ आंदोलन के इस नायक को कानू दा कहते हà¥à¤ जिन शबà¥à¤¦à¥‹à¤‚ में याद करते हैं, वे शबà¥à¤¦ न सिरà¥à¤« इस अà¤à¤¿à¤¶à¤ªà¥à¤¤ नायक को समà¥à¤®à¤¾à¤¨ देते हैं; बलà¥à¤•ि लेखक को पतà¥à¤°à¤•ारिता से परे साहितà¥à¤¯ की दà¥à¤¨à¤¿à¤¯à¤¾ का हिसà¥à¤¸à¤¾ बना जाते हैं। लेखक के ही शबà¥à¤¦à¥‹à¤‚ में इस (अ)नायक को नमन, “वे à¤à¤Ÿà¤•े हà¥à¤ आंदोलन का आख़िरी पà¥à¤°à¤¤à¥€à¤• थे, किंतॠउनके मन और करà¥à¤® में विकलà¥à¤ªà¥‹à¤‚ को लेकर लगातार à¤à¤• कोशिश जारी रही।†(लेखिका देश की पà¥à¤°à¤–à¥à¤¯à¤¾à¤¤ कहानीकार à¤à¤µà¤‚ उपनà¥à¤¯à¤¾à¤¸à¤•ार हैं। इन दिनों à¤à¥‹à¤ªà¤¾à¤² में रहती हैं।) |
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